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9 साल के वेंकटेश की बंधुआ मजदूरी में मौत: आंध्र प्रदेश से आई एक झकझोर देने वाली सच्चाई

 

9 साल के वेंकटेश की बंधुआ मजदूरी में मौत: आंध्र प्रदेश से आई एक झकझोर देने वाली सच्चाई

भारत में बाल श्रम और बंधुआ मजदूरी भले ही कानूनी रूप से प्रतिबंधित हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है। हाल ही में आंध्र प्रदेश के तिरुपति जिले से आई एक खबर ने इन कुप्रथाओं की मौजूदगी को फिर से सामने ला दिया। एक 9 वर्षीय आदिवासी बालक, वेंकटेश, को उसकी मां द्वारा 25,000 रुपये के कर्ज के बदले एक व्यक्ति के पास काम पर छोड़ दिया गया। अंततः वेंकटेश की मौत हो गई — न इंसाफ मिला, न अंतिम विदाई।

कैसे बना वेंकटेश बंधुआ मजदूर?

वेंकटेश की मां अंकम्मा ने आर्थिक संकट के चलते एक स्थानीय व्यक्ति मुथु से ₹25,000 उधार लिए थे। उधार न चुका पाने की स्थिति में, उसने अपने नाबालिग बेटे को “गारंटी” के तौर पर मुथु के पास भेज दिया। वेंकटेश को बतख पालन का काम दिया गया, जहां उसे अमानवीय परिस्थितियों में काम करना पड़ा। उचित देखरेख और चिकित्सा के अभाव में वह पीलिया से ग्रसित हो गया और उसकी मौत हो गई।

शव को छिपा दिया गया

वेंकटेश की मौत के बाद, मुथु और उसके परिवार ने न तो उसकी मां को जानकारी दी, न ही पुलिस को। बल्कि, उन्होंने चुपचाप उसका शव तमिलनाडु के कांचीपुरम में दफना दिया। यह पूरी प्रक्रिया साफ तौर पर एक बड़े अपराध की ओर इशारा करती है।

पुलिस की जांच और गिरफ्तारी

शिकायत मिलने पर पुलिस हरकत में आई। मुथु, उसकी पत्नी और बेटे को गिरफ्तार किया गया। उन पर विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया गया है:

  • बंधुआ मजदूरी (उन्मूलन) अधिनियम, 1976

  • बाल श्रम (प्रतिबंध और विनियमन) अधिनियम

  • किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम

  • अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम

पुलिस अब यह भी जांच कर रही है कि क्या इस परिवार के अन्य बच्चों को भी इसी प्रकार काम पर लगाया गया था।

कानूनी और सामाजिक असफलता

वेंकटेश की मौत न केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि यह एक प्रणालीगत विफलता भी है। सवाल यह उठता है कि:

  • एक 9 वर्षीय बालक को किसी के पास काम पर भेजना क्या किसी की मजबूरी होनी चाहिए?

  • इतने बड़े स्तर पर बाल मजदूरी और बंधुआ प्रथा कैसे फल-फूल रही है?

  • सरकारी योजनाएं और संरक्षण प्रणाली कहाँ विफल हो रही हैं?

समाधान के सुझाव

  1. जमीनी स्तर पर निगरानी: सरकार को ज़िला स्तर पर बाल संरक्षण समितियों को सक्रिय करना चाहिए।

  2. शिक्षा और पुनर्वास: आदिवासी और पिछड़े क्षेत्रों में शिक्षा के साथ-साथ आर्थिक सहायता के माध्यम से पुनर्वास योजनाएं शुरू की जानी चाहिए।

  3. एनजीओ की भागीदारी: स्थानीय NGOs को अधिकारिक रूप से निगरानी और रिपोर्टिंग में भागीदार बनाया जाना चाहिए।

  4. सख्त दंड और त्वरित न्याय: बाल श्रम और बंधुआ मजदूरी के मामलों में फास्ट-ट्रैक कोर्ट के ज़रिए त्वरित और कठोर सज़ा दी जाए।

निष्कर्ष

वेंकटेश अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी कहानी एक चेतावनी है। जब तक समाज, सरकार और प्रत्येक नागरिक मिलकर इन कुप्रथाओं के खिलाफ नहीं लड़ते, तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी। यह जरूरी है कि हम सिर्फ कानून न बनाएं, बल्कि उनके क्रियान्वयन की गारंटी भी करें।

वेंकटेश की आत्मा तभी शांति पाएगी, जब हम यह सुनिश्चित कर सकें कि अब कोई और बच्चा कर्ज की कीमत अपने जीवन से न चुकाए।


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