📈 एनबीएफसी का विदेशी फंडिंग की ओर बढ़ता रुझान
भारतीय गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ (एनबीएफसी) अब विदेशी फंडिंग की ओर रुख कर रही हैं, विशेष रूप से एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स (ईसीबी) के माध्यम से। वित्त वर्ष 2024-25 में, एनबीएफसी ने कुल $61 बिलियन ईसीबी में से 43% हिस्सा जुटाया, जो पिछले पांच वर्षों के औसत 20-37% से कहीं अधिक है। @EconomicTimes
💰 विदेशी फंडिंग के लाभ
कम लागत: ईसीबी के माध्यम से फंडिंग की लागत घरेलू बैंकों की तुलना में 20-30 बेसिस पॉइंट्स कम है, भले ही हेजिंग लागत शामिल की जाए। @EconomicTimes
फंडिंग स्रोतों में विविधता: विदेशी फंडिंग से एनबीएफसी अपने फंडिंग स्रोतों में विविधता ला सकते हैं, जिससे जोखिम कम होता है और वित्तीय स्थिरता बढ़ती है।
🏦 घरेलू बैंकों की धीमी प्रतिक्रिया
हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) द्वारा 50 बेसिस पॉइंट्स की रेपो रेट कटौती के बावजूद, घरेलू बैंकों ने अपने मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्स बेस्ड लेंडिंग रेट (एमसीएलआर) में केवल 5-10 बेसिस पॉइंट्स की कटौती की है, जिससे एनबीएफसी को अपेक्षित लाभ नहीं मिल रहा है। @EconomicTimes
🌍 प्रमुख एनबीएफसी की रणनीतियाँ
श्रीराम फाइनेंस: कंपनी ने मार्च 2025 तक 15% विदेशी फंडिंग जुटाई है और आगे येन-डिनॉमिनेटेड फंडिंग की योजना बना रही है। Reuters
टाटा कैपिटल: कंपनी अगले वित्तीय वर्ष में $750 मिलियन की विदेशी फंडिंग जुटाने की योजना बना रही है। Reuters
मुथूट फाइनेंस: कंपनी ने 7.375% कूपन रेट पर $500 मिलियन के अमेरिकी डॉलर-डिनॉमिनेटेड बॉन्ड जारी किए हैं। Reuters
🔮 निष्कर्ष
भारतीय एनबीएफसी के लिए विदेशी फंडिंग एक आकर्षक विकल्प बनता जा रहा है, जिससे वे अपनी फंडिंग लागत कम कर सकते हैं और फंडिंग स्रोतों में विविधता ला सकते हैं। हालांकि, विदेशी फंडिंग के साथ आने वाले जोखिमों और विनियमनों को ध्यान में रखते हुए, एनबीएफसी को सतर्कता और रणनीतिक योजना के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

